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खेत बचाओ अभियान 2026: बेमेतरा के 90 किसानों को मिला वैज्ञानिक कृषि का मार्गदर्शन, प्राकृतिक खेती पर जोर :

खेत बचाओ अभियान 2026 के तहत बेमेतरा में 90 किसानों को कीट एवं रोग प्रबंधन, प्राकृतिक खेती, IPM और मृदा स्वास्थ्य की जानकारी दी गई।

खेत बचाओ अभियान 2026 के तहत बेमेतरा में किसानों को कीट एवं रोग प्रबंधन, प्राकृतिक खेती और टिकाऊ कृषि के बारे में जागरूक करते कृषि विशेषज्ञ।
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HIGHLIGHTS

5 Key Highlight

1.ICAR-NIBSM रायपुर ने KVK बेमेतरा और कृषि विभाग के सहयोग से जागरूकता कार्यक्रम आयोजित किए।
2.ग्राम दर्री और ग्राम पतोरा में आयोजित कार्यक्रमों में कुल 90 किसानों की भागीदारी बताई गई।
3.किसानों को समन्वित कीट प्रबंधन (IPM) और फसलों में कीट एवं रोगों की समय पर पहचान की जानकारी दी गई।
4.प्राकृतिक खेती, संतुलित उर्वरक उपयोग और मृदा स्वास्थ्य संरक्षण पर जोर दिया गया।
5.किसान-वैज्ञानिक संवाद के माध्यम से स्थानीय कृषि समस्याओं के व्यावहारिक समाधान सुझाए गए।

छत्तीसगढ़ में किसानों को वैज्ञानिक कृषि पद्धतियों के प्रति जागरूक करने के उद्देश्य से भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद के राष्ट्रीय जैविक स्ट्रेस प्रबंधन संस्थान (ICAR-NIBSM), रायपुर द्वारा ‘खेत बचाओ अभियान-2026’ के अंतर्गत किसान जागरूकता कार्यक्रम आयोजित किए गए। कृषि विज्ञान केंद्र (KVK), बेमेतरा और कृषि विभाग के सहयोग से बेमेतरा जिले के ग्राम दर्री और ग्राम पतोरा में आयोजित इन कार्यक्रमों में किसानों को फसलों को कीट एवं रोगों से बचाने, मृदा स्वास्थ्य बनाए रखने और टिकाऊ कृषि पद्धतियाँ अपनाने की जानकारी दी गई।

इस अभियान का प्रमुख उद्देश्य फसल नुकसान कम करना, कृषि संसाधनों का बेहतर उपयोग करना और वैज्ञानिक कृषि तकनीकों को किसानों के खेतों तक पहुँचाना है। भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद की इस पहल के व्यापक रबी अभियान में प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण, संतुलित उर्वरक उपयोग और जलवायु-अनुकूल खेती पर भी जोर दिया गया है।

कीट एवं रोग प्रबंधन के लिए वैज्ञानिक उपायों पर जोर :

कृषि विशेषज्ञों ने बताया कि फसलों में कीटों और रोगों की समय पर पहचान करना उत्पादन हानि कम करने के लिए महत्वपूर्ण है। शुरुआती लक्षणों की अनदेखी करने से नुकसान बढ़ सकता है और बाद में नियंत्रण पर अधिक खर्च करना पड़ सकता है।

किसानों को निम्नलिखित उपायों की जानकारी दी गई:

  • समन्वित कीट प्रबंधन (IPM): जैविक, यांत्रिक, कृषि संबंधी और आवश्यकता के अनुसार रासायनिक उपायों का समन्वित उपयोग।
  • नियमित फसल निगरानी: खेत में कीटों, रोगों और पौधों में दिखाई देने वाले असामान्य लक्षणों की समय पर पहचान।
  • संतुलित उर्वरक उपयोग: फसल की आवश्यकता और मिट्टी की स्थिति के अनुसार पोषक तत्वों का उचित प्रयोग।
  • मृदा स्वास्थ्य संरक्षण: मिट्टी की उर्वरता और कृषि संसाधनों की दीर्घकालीन क्षमता बनाए रखना।
  • कीटनाशकों का विवेकपूर्ण प्रयोग: सही उत्पाद, अनुशंसित मात्रा, उचित समय और सुरक्षा संबंधी निर्देशों का पालन।

समन्वित कीट प्रबंधन का उद्देश्य केवल रासायनिक कीटनाशकों पर निर्भरता बढ़ाना नहीं, बल्कि फसल सुरक्षा के प्रभावी और पर्यावरण-अनुकूल उपायों को प्राथमिकता देना है। रासायनिक उत्पादों का उपयोग आवश्यकता और कृषि विशेषज्ञों की अनुशंसा के अनुसार ही किया जाना चाहिए।

प्राकृतिक खेती और टिकाऊ कृषि को मिलेगा प्रोत्साहन :

कार्यक्रमों में किसानों को जैविक एवं प्राकृतिक खेती के लाभों से परिचित कराया गया। इस अवसर पर प्राकृतिक खेती पर आधारित एक प्रकाशन भी वितरित किया गया, जिससे किसानों को संबंधित तकनीकों की जानकारी मिल सके।

टिकाऊ कृषि का उद्देश्य वर्तमान उत्पादन आवश्यकताओं को पूरा करते हुए मिट्टी, जल और अन्य प्राकृतिक संसाधनों की गुणवत्ता बनाए रखना है। इसके लिए संतुलित पोषण, जैविक एवं जैव उर्वरकों का उपयुक्त उपयोग, फसल अवशेषों का वैज्ञानिक प्रबंधन और स्थानीय परिस्थितियों के अनुकूल कृषि तकनीकों को अपनाना उपयोगी हो सकता है।

ICAR-NIBSM और KVK बेमेतरा के सहयोग से संचालित व्यापक रबी अभियान में 22 अक्टूबर से 30 नवंबर 2026 तक किसानों को जागरूक करने की योजना बताई गई है। इसमें फसल विविधीकरण, दलहन एवं तिलहन उत्पादन, धान की कटाई के बाद खाली रहने वाले खेतों के उपयोग और प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण पर भी ध्यान दिया जा रहा है।

किसान-वैज्ञानिक संवाद से स्थानीय समस्याओं का समाधान :

कार्यक्रम के दौरान आयोजित किसान-वैज्ञानिक संवाद में किसानों ने अपनी कृषि संबंधी समस्याएँ और चुनौतियाँ साझा कीं। विशेषज्ञों ने स्थानीय परिस्थितियों के अनुसार व्यावहारिक सुझाव दिए और फसल सुरक्षा तकनीकों को अपनाने के लिए प्रेरित किया।

कृषि संबंधी समस्याएँ हर क्षेत्र में एक जैसी नहीं होतीं। मिट्टी की प्रकृति, मौसम, उपलब्ध सिंचाई, फसल का प्रकार और स्थानीय कीट-रोग की स्थिति के आधार पर समाधान अलग-अलग हो सकते हैं। कृषि विज्ञान केंद्रों के माध्यम से किसानों को स्थानीय परिस्थितियों के अनुकूल वैज्ञानिक सलाह उपलब्ध कराना अनुसंधान और खेत के बीच की दूरी कम करने का एक महत्वपूर्ण माध्यम है।

समाचार विश्लेषण: छत्तीसगढ़ की कृषि के लिए क्यों महत्वपूर्ण है यह अभियान?

छत्तीसगढ़ में धान प्रमुख फसलों में शामिल है। ऐसे में फसल सुरक्षा, मिट्टी की उर्वरता और कृषि संसाधनों का संतुलित उपयोग किसानों की आय और उत्पादन स्थिरता से जुड़ा विषय है। कीट एवं रोगों के कारण होने वाला नुकसान किसानों की मेहनत के साथ-साथ बीज, उर्वरक, सिंचाई और अन्य कृषि निवेशों को भी प्रभावित कर सकता है।

खेत बचाओ अभियान की उपयोगिता तीन प्रमुख बिंदुओं में समझी जा सकती है:

  1. उत्पादन हानि में कमी: कीटों और रोगों की समय पर पहचान से उचित नियंत्रण उपाय अपनाने में मदद मिल सकती है।
  2. कृषि लागत का बेहतर प्रबंधन: आवश्यकता के अनुसार उर्वरक और कीटनाशक इस्तेमाल करने से अनावश्यक खर्च घटाने की संभावना रहती है।
  3. दीर्घकालीन टिकाऊ खेती: मृदा स्वास्थ्य, फसल विविधीकरण और प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण से कृषि प्रणाली की मजबूती बढ़ सकती है।

आगे की राह :

अभियान के प्रभाव को बढ़ाने के लिए गांव स्तर पर नियमित प्रशिक्षण, खेतों में व्यावहारिक प्रदर्शन, स्थानीय भाषा में सरल कृषि साहित्य और फसल की अवस्था के अनुसार समय पर सलाह उपलब्ध कराना आवश्यक है। महिला किसानों की भागीदारी को प्रोत्साहित करना तथा किसानों द्वारा अपनाई गई तकनीकों के परिणामों का मूल्यांकन करना भी उपयोगी होगा।

निष्कर्ष:

खेत बचाओ अभियान-2026 वैज्ञानिक कृषि ज्ञान को किसानों तक पहुँचाने की महत्वपूर्ण पहल है। इसकी सफलता केवल जागरूकता कार्यक्रम आयोजित करने से नहीं, बल्कि किसानों द्वारा उपयुक्त तकनीकों को अपनाने और उनके परिणामों में सुधार से मापी जानी चाहिए।

संदर्भ स्रोत : प्रेस सूचना ब्यूरो (PIB)

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