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राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु ने बस्तर दशहरा 2026 में की जनजातीय संस्कृति की सराहना, मुरिया दरबार को बताया लोकतांत्रिक मूल्यों का प्रतीक :

राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु ने बस्तर दशहरा 2026 के मुरिया दरबार में जनजातीय संस्कृति, सामाजिक समरसता और लोकतांत्रिक परंपराओं की सराहना की। जानें प्रमुख बातें।

राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु बस्तर दशहरा 2026 में मुरिया दरबार, जनजातीय संस्कृति और बस्तर विकास के संदेश के साथ
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HIGHLIGHTS

5 Key Highlight Points

  1. राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु ने बस्तर दशहरा को जनजातीय विरासत और सामूहिक आस्था का प्रतीक बताया।

  2. मुरिया दरबार को जमीनी लोकतंत्र, सामूहिक निर्णय और सामाजिक संवाद का उत्कृष्ट उदाहरण बताया गया।

  3. मांझियों का मासिक मानदेय ₹5,000 और चालकियों का ₹3,500 किए जाने की जानकारी दी गई।

  4. राष्ट्रपति ने जनजातीय संस्कृति के संरक्षण के साथ बच्चों की शिक्षा और विकास पर जोर दिया।

  5. मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय ने माओवाद से मुक्त बस्तर में नवनिर्माण, सड़क, स्वास्थ्य, शिक्षा और रोजगार को प्राथमिकता देने की बात कही।

छत्तीसगढ़ की जनजातीय संस्कृति और ऐतिहासिक परंपराओं को राष्ट्रीय स्तर पर पहचान दिलाने वाले अवसर पर राष्ट्रपति श्रीमती द्रौपदी मुर्मु ने 23 अक्टूबर 2026 को जगदलपुर में आयोजित बस्तर दशहरा उत्सव के मुरिया दरबार में सहभागिता की। उन्होंने बस्तर दशहरा को छत्तीसगढ़ के सांस्कृतिक गौरव, सामूहिक आस्था और सामाजिक समरसता का जीवंत प्रतीक बताया। राष्ट्रपति ने जनजातीय समाज की पारंपरिक व्यवस्था, सामूहिक निर्णय प्रणाली, प्रकृति के प्रति सम्मान और सांस्कृतिक विरासत को संरक्षित रखने पर विशेष जोर दिया।

बस्तर दशहरा: देश के अन्य दशहरा उत्सवों से अलग पहचान :

बस्तर दशहरा छत्तीसगढ़ के बस्तर अंचल का विशिष्ट धार्मिक एवं सांस्कृतिक पर्व है। इसकी सबसे बड़ी विशेषता यह है कि यह लगभग 75 दिनों तक चलने वाला उत्सव है और यहां सामान्य दशहरा परंपरा की तरह रावण के पुतले का दहन इसकी मुख्य पहचान नहीं है। इसका केंद्र मां दंतेश्वरी की आराधना, स्थानीय देवी-देवताओं की परंपराएं और जनजातीय समुदायों की सामूहिक भागीदारी है। जिला बस्तर प्रशासन के अनुसार, उत्सव की शुरुआत श्रावण महीने की अमावस्या के आसपास पाट जात्रा से होती है, जिसमें रथ निर्माण के लिए लकड़ी लाने की परंपरा जुड़ी है। उत्सव का समापन मुरिया दरबार से संबंधित परंपराओं के साथ होता है।

मुरिया दरबार क्या है? राष्ट्रपति ने क्यों की इसकी सराहना?

मुरिया दरबार बस्तर दशहरा की महत्वपूर्ण ऐतिहासिक परंपराओं में से एक है। इसमें पारंपरिक जनजातीय नेतृत्व और प्रशासन के बीच संवाद का अवसर मिलता है। मांझी, चालकी तथा अन्य पारंपरिक प्रतिनिधियों की भूमिका स्थानीय समुदायों की समस्याओं, आवश्यकताओं और सामाजिक विषयों को सामने रखने में महत्वपूर्ण मानी जाती है। मुरिया दरबार को पारंपरिक सामुदायिक नेतृत्व और सरकारी अधिकारियों के बीच स्थानीय मुद्दों पर संवाद का माध्यम बताती है।

राष्ट्रपति मुर्मु ने मुरिया दरबार को जमीनी स्तर पर लोकतांत्रिक मूल्यों की अभिव्यक्ति के रूप में देखा। उनके संबोधन के अनुसार, जनजातीय समाज में सामूहिक विचार-विमर्श, आपसी सहमति और सामाजिक जिम्मेदारी की पुरानी परंपरा रही है। गांवों में विवाद या मतभेद होने पर पारंपरिक प्रमुख और बुजुर्ग संबंधित पक्षों की बात सुनकर समाधान खोजने का प्रयास करते हैं। बड़ी समस्याओं के लिए पीड़-परगना और देश-परगना जैसी पारंपरिक संस्थाओं की भूमिका भी महत्वपूर्ण रही है।

“मैं भी मांझी की बेटी हूं”: राष्ट्रपति का जनजातीय परंपराओं से जुड़ाव :

अपने संबोधन में राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु ने अपने परिवार की पारंपरिक पृष्ठभूमि का उल्लेख करते हुए कहा कि उनके दादाजी, पिता और भाई मांझी रहे थे। उन्होंने स्वयं को मांझी की बेटी और गांव के मुखिया की बेटी बताते हुए जनजातीय संस्कृति एवं परंपराओं से अपने गहरे जुड़ाव की बात कही।

राष्ट्रपति ने कहा कि समय के साथ शासन व्यवस्था और कानून बदलते रहे हैं, लेकिन समुदायों ने अपने सामाजिक नियमों और परंपराओं को पीढ़ियों तक बनाए रखा है।उन्होंने यह भी कहा कि शिक्षा और विकास के अवसर अपनाते हुए अपनी सांस्कृतिक पहचान को सुरक्षित रखना जरूरी है। बच्चों को अच्छी शिक्षा देना, नई संभावनाओं के लिए तैयार करना और साथ ही लोकगीत, लोकनृत्य, रीति-रिवाजों तथा पारंपरिक संस्थाओं से परिचित कराना समाज के भविष्य के लिए आवश्यक है।

मांझी और चालकी के मानदेय में वृद्धि :

बस्तर दशहरा 2026 के दौरान पारंपरिक जनजातीय प्रतिनिधियों के आर्थिक सम्मान का विषय भी सामने आया। कार्यक्रम में दी गई जानकारी के अनुसार, मांझियों का मासिक मानदेय ₹2,000 से बढ़ाकर ₹5,000 और चालकियों का मानदेय ₹1,500 से बढ़ाकर ₹3,500 किया गया है।

यह कदम उन पारंपरिक प्रतिनिधियों के योगदान को मान्यता देने की दिशा में महत्वपूर्ण है, जो समुदायों की सामाजिक व्यवस्था, सांस्कृतिक परंपराओं और सामूहिक आयोजनों को बनाए रखने में भूमिका निभाते हैं।

माओवाद से आगे बढ़ता बस्तर: विकास की नई संभावनाएं :

मुख्यमंत्री श्री विष्णुदेव साय ने कहा कि बस्तर हिंसक माओवाद की चुनौती से आगे बढ़कर नवनिर्माण और विकास की दिशा में आगे बढ़ रहा है। उन्होंने क्षेत्र के विकास के लिए सड़क, परिवहन, स्वास्थ्य, शिक्षा, पर्यटन और वनोपज आधारित आजीविका को महत्वपूर्ण बताया।

मुख्यमंत्री के संबोधन में निम्नलिखित पहलों का उल्लेख किया गया:

1.नियद नेल्लानार योजना: दूरस्थ क्षेत्रों तक सरकारी योजनाओं और मूलभूत सेवाओं की पहुंच बढ़ाने का प्रयास।

2.सड़क संपर्क: प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना तथा पीएम-जनमन के माध्यम से अंदरूनी बसाहटों को जोड़ने पर जोर।

3.परिवहन एवं रेल संपर्क: ग्रामीण परिवहन सुविधाओं के विस्तार तथा रावघाट-जगदलपुर रेल लाइन पर काम का उल्लेख।

4.स्वास्थ्य एवं शिक्षा: जगदलपुर में सुपर स्पेशियलिटी अस्पताल, गीदम में मेडिकल कॉलेज और ओरछा व जगरगुंडा में एजुकेशन सिटी से संबंधित पहलों का उल्लेख।

5.स्थानीय आजीविका एवं पर्यटन: वनोपज संग्राहकों को उचित मूल्य दिलाने, वन धन केंद्रों और होम-स्टे जैसी सुविधाओं को बढ़ावा देने के प्रयास।

राष्ट्रपति ने भी केंद्र और राज्य सरकार के समन्वित प्रयासों का उल्लेख करते हुए कहा कि जनजातीय उद्यमियों को वित्तीय सहायता और बाजार से जोड़ना समावेशी विकास के लिए महत्वपूर्ण है।

प्रकृति संरक्षण और जनजातीय जीवन दर्शन :

राष्ट्रपति मुर्मु ने जनजातीय समाज की प्रकृति-पूजा और पर्यावरण के प्रति सम्मान की परंपरा की सराहना की। उन्होंने जंगलों, पहाड़ों, पेड़-पौधों और प्राकृतिक संसाधनों को भावी पीढ़ियों की अमूल्य धरोहर बताते हुए उनके संरक्षण एवं संवर्धन की आवश्यकता पर बल दिया।

बस्तर जैसे वनाच्छादित क्षेत्र में पर्यावरण संरक्षण का संबंध केवल जैव विविधता से नहीं, बल्कि आजीविका, स्थानीय संस्कृति और सामुदायिक जीवन से भी है। वनों का सतत उपयोग, स्थानीय समुदायों की भागीदारी, पौधरोपण और प्राकृतिक संसाधनों का जिम्मेदार प्रबंधन विकास की दीर्घकालिक रणनीति का हिस्सा होना चाहिए।

समाचार विश्लेषण: बस्तर के लिए इस आयोजन का व्यापक महत्व

बस्तर दशहरा और मुरिया दरबार को तीन प्रमुख दृष्टिकोणों से समझा जा सकता है।

1. सांस्कृतिक संरक्षण: स्थानीय परंपराओं को राष्ट्रीय मंच मिलने से जनजातीय पहचान, लोककला और पारंपरिक ज्ञान को नई पहचान मिलती है। संस्कृति का संरक्षण केवल उत्सव आयोजित करने तक सीमित न रहे; स्थानीय भाषाओं, लोकगीतों, हस्तशिल्प और मौखिक परंपराओं का दस्तावेजीकरण भी जरूरी है।

2. लोकतांत्रिक सहभागिता: मुरिया दरबार सामुदायिक संवाद की परंपरा को सामने लाता है। इसे स्थानीय समस्याओं की पहचान, प्रशासन तक समुदायों की आवाज पहुंचाने और जनभागीदारी बढ़ाने के अवसर के रूप में देखा जा सकता है। साथ ही महिलाओं, युवाओं और समाज के विभिन्न वर्गों की सार्थक भागीदारी भी सुनिश्चित होनी चाहिए।

3. सुरक्षा से सतत विकास की ओर: हिंसा से प्रभावित क्षेत्रों में स्थायी शांति के लिए सुरक्षा के साथ शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार, संचार, सड़क और आजीविका के अवसर आवश्यक हैं। विकास योजनाओं को स्थानीय जरूरतों, सामाजिक विश्वास और समुदायों की भागीदारी के आधार पर लागू करना महत्वपूर्ण होगा।

इस प्रकार, बस्तर के भविष्य की दिशा केवल बुनियादी ढांचे के विस्तार से तय नहीं होगी, बल्कि इस बात से भी तय होगी कि विकास के लाभ स्थानीय लोगों तक कितने प्रभावी ढंग से पहुंचते हैं और उनकी सांस्कृतिक पहचान कितनी सुरक्षित रहती है।

महत्वपूर्ण तथ्य :

स्थान: जगदलपुर, बस्तर जिला, छत्तीसगढ़।

प्रमुख धार्मिक केंद्र: मां दंतेश्वरी।

बस्तर दशहरा की अवधि: लगभग 75 दिन।

प्रमुख विशेषता: रावण दहन के बजाय मां दंतेश्वरी और स्थानीय देवी-देवताओं से जुड़ी विशिष्ट परंपराएं।

पाट जात्रा: रथ निर्माण के लिए लकड़ी लाने से जुड़ा प्रारंभिक अनुष्ठान।

मुरिया दरबार: पारंपरिक जनजातीय नेतृत्व, सामुदायिक संवाद और स्थानीय समस्याओं पर विचार-विमर्श का मंच।

पारंपरिक संस्थाएं: मांझी, चालकी, पीड़-परगना और देश-परगना।

मानदेय में घोषित वृद्धि: मांझी ₹5,000 प्रतिमाह और चालकी ₹3,500 प्रतिमाह।

आगे की राह :

जनजातीय कला, भाषाओं, लोकगीतों और पारंपरिक ज्ञान का व्यवस्थित संरक्षण किया जाए। मुरिया दरबार जैसे मंचों के माध्यम से स्थानीय समस्याओं और प्रशासनिक योजनाओं के बीच बेहतर समन्वय स्थापित किया जाए।

शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार और परिवहन सुविधाओं की प्रगति का नियमित मूल्यांकन हो।मांझी-चालकी सहित पारंपरिक प्रतिनिधियों के मानदेय और अन्य सहयोग का समयबद्ध क्रियान्वयन सुनिश्चित किया जाए। वनों एवं प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण में स्थानीय समुदायों की भागीदारी बढ़ाई जाए।

निष्कर्ष :

राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु की बस्तर दशहरा 2026 में सहभागिता ने छत्तीसगढ़ की जनजातीय संस्कृति, सामूहिक आस्था और पारंपरिक सामाजिक व्यवस्था को राष्ट्रीय स्तर पर रेखांकित किया। मुरिया दरबार यह संदेश देता है कि सामाजिक विश्वास, संवाद और सामूहिक जिम्मेदारी सुशासन के महत्वपूर्ण आधार हैं। अब आवश्यकता है कि बस्तर की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत को सुरक्षित रखते हुए शिक्षा, स्वास्थ्य, आजीविका, पर्यावरण संरक्षण और बुनियादी सुविधाओं के क्षेत्र में टिकाऊ प्रगति सुनिश्चित की जाए। यही सांस्कृतिक गौरव को समावेशी विकास में बदलने का रास्ता है।

स्रोत :

राष्ट्रपति सचिवालय — बस्तर दशहरा कार्यक्रम की आधिकारिक विज्ञप्ति

जिला बस्तर प्रशासन — संस्कृति एवं विरासत

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