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कोंडागांव के बानू राम बैद को शिल्प गुरु अवार्ड 2025 के लिए चुना गया, बस्तर की ढोकरा कला को राष्ट्रीय पहचान :

कोंडागांव के ढोकरा शिल्पकार बानू राम बैद का शिल्प गुरु अवार्ड 2025 के लिए चयन हुआ। जानें बस्तर की ढोकरा कला, लॉस्ट-वैक्स तकनीक और उपयोगी तथ्य।

कोंडागांव के बानू राम बैद को शिल्प गुरु अवार्ड 2025 के लिए चुना गया
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HIGHLIGHTS

5 प्रमुख हाईलाइट

1. बानू राम बैद का चयन: छत्तीसगढ़ के कोंडागांव जिले के ढोकरा शिल्पकार बानू राम बैद का शिल्प गुरु अवार्ड 2025 के लिए चयन हुआ है।

2. देशभर के 6 शिल्पकार चयनित: इस पुरस्कार के लिए देशभर से छह उत्कृष्ट हस्तशिल्प कलाकारों का चयन किया गया है।

3. बस्तर की ढोकरा कला को पहचान: बैद पारंपरिक बेलमेटल शिल्प के माध्यम से बस्तर की जनजातीय संस्कृति, लोकजीवन और धार्मिक परंपराओं को कलाकृतियों में उकेरते हैं।

4. लॉस्ट-वैक्स तकनीक का संरक्षण: उनकी कला में प्राचीन मोम-ढलाई तकनीक का उपयोग होता है, जिसे ढोकरा शिल्प की प्रमुख विशेषता माना जाता है।

5. नई पीढ़ी को प्रशिक्षण: पारंपरिक शिल्प को संरक्षित करने और युवा पीढ़ी तक पहुँचाने में उनके योगदान को इस चयन का महत्वपूर्ण पहलू माना गया है।

छत्तीसगढ़ के बस्तर अंचल की पारंपरिक ढोकरा (बेलमेटल) शिल्पकला को राष्ट्रीय स्तर पर एक और पहचान मिली है। कोंडागांव जिले के माकड़ी विकासखंड के ग्राम बरकई निवासी शिल्पकार बानू राम बैद का चयन वर्ष 2025 के प्रतिष्ठित शिल्प गुरु अवार्ड के लिए किया गया है। भारत सरकार के वस्त्र मंत्रालय के विकास आयुक्त (हस्तशिल्प) कार्यालय द्वारा जारी अंतिम चयन सूची में उनका नाम शामिल है। देशभर से इस सम्मान के लिए कुल छह शिल्पकारों का चयन किया गया है।

बानू राम बैद ने बस्तर की प्राचीन ढोकरा कला को संरक्षित रखने, पारंपरिक तकनीक को आगे बढ़ाने और नई पीढ़ी को इसका प्रशिक्षण देने में योगदान दिया है। उनकी उपलब्धि कोंडागांव जिले के साथ-साथ पूरे छत्तीसगढ़ और बस्तर की सांस्कृतिक विरासत के लिए महत्वपूर्ण है।

मुख्य बातें एक नजर में :

  • शिल्पकार: बानू राम बैद।
  • निवास: ग्राम बरकई, विकासखंड माकड़ी, जिला कोंडागांव, छत्तीसगढ़।
  • सम्मान: शिल्प गुरु अवार्ड 2025 के लिए चयन।
  • शिल्पकला: पारंपरिक ढोकरा (बेलमेटल) कला।
  • चयन समिति की बैठक: 18 जुलाई 2026।
  • चयनित शिल्पकार: देशभर से कुल छह।
  • संबंधित केंद्रीय मंत्रालय: वस्त्र मंत्रालय, भारत सरकार।
  • प्रमुख योगदान: पारंपरिक कला का संरक्षण, प्रचार-प्रसार और नई पीढ़ी को प्रशिक्षण।

क्या है शिल्प गुरु अवार्ड?

शिल्प गुरु अवार्ड भारत सरकार के वस्त्र मंत्रालय द्वारा हस्तशिल्प के क्षेत्र में उत्कृष्ट योगदान देने वाले शिल्पकारों को प्रदान किया जाने वाला प्रतिष्ठित सम्मान है। इसका उद्देश्य पारंपरिक हस्तशिल्प की उत्कृष्टता, तकनीकी कौशल और सांस्कृतिक विरासत के संरक्षण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाले कलाकारों को पहचान देना है। यह सम्मान उन शिल्पकारों के योगदान को रेखांकित करता है, जो पारंपरिक कलाओं को जीवित रखने के साथ-साथ उनके विकास और अगली पीढ़ी तक हस्तांतरण के लिए काम करते हैं।

बानू राम बैद का चयन इस दृष्टि से महत्वपूर्ण है कि ढोकरा जैसी पारंपरिक कला में कौशल केवल अंतिम कलाकृति बनाने तक सीमित नहीं होता। इसमें सामग्री की समझ, पारंपरिक विधियों का ज्ञान और लंबे अभ्यास से विकसित तकनीकी दक्षता भी आवश्यक होती है।

क्या है बस्तर की ढोकरा (बेलमेटल) शिल्पकला?

ढोकरा कला धातु से कलाकृतियां बनाने की एक पारंपरिक शिल्प विधा है। बस्तर क्षेत्र में इस कला के माध्यम से आदिवासी जीवन, लोक-संस्कृति, देवी-देवताओं, पशु-पक्षियों और प्रकृति से जुड़े विषयों को अभिव्यक्त किया जाता है।

इस शिल्प की प्रमुख तकनीकों में लॉस्ट-वैक्स (Lost-Wax) या मधुच्छिष्ट विधि शामिल है। इसमें मोम की सहायता से कलाकृति का प्रारूप तैयार किया जाता है। इसके बाद मिट्टी की परतों से सांचा बनाया जाता है। गर्म करने पर मोम बाहर निकल जाता है और उसके स्थान पर पिघली हुई धातु डालकर आकृति तैयार की जाती है। सांचा हटाने और आवश्यक परिष्करण के बाद कलाकृति अपना अंतिम रूप प्राप्त करती है।

बानू राम बैद की कलाकृतियों में झलकती है बस्तर की संस्कृति :

बानू राम बैद की कलाकृतियों में बस्तर के आदिवासी जनजीवन, लोक परंपराओं, देवी-देवताओं और प्राकृतिक परिवेश की झलक दिखाई देती है। उनकी कला स्थानीय सांस्कृतिक अनुभवों को धातु की आकृतियों के माध्यम से प्रस्तुत करती है। पारंपरिक शिल्पकारों का योगदान केवल वस्तुओं का निर्माण करना नहीं है। वे अपने अनुभव, तकनीक और सांस्कृतिक ज्ञान को अगली पीढ़ी तक पहुंचाने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।

कोंडागांव और छत्तीसगढ़ के लिए क्यों महत्वपूर्ण है यह उपलब्धि?

कोंडागांव और बस्तर क्षेत्र की सांस्कृतिक पहचान में पारंपरिक हस्तशिल्प का महत्वपूर्ण स्थान है। ऐसी कलाएं स्थानीय समुदायों के ज्ञान, जीवनशैली और सांस्कृतिक परंपराओं को पीढ़ियों तक सुरक्षित रखने में मदद करती हैं। बानू राम बैद का चयन तीन स्तरों पर महत्वपूर्ण माना जा सकता है।

1. सांस्कृतिक संरक्षण: पारंपरिक ढोकरा कला को राष्ट्रीय स्तर पर पहचान मिलने से इसके संरक्षण की आवश्यकता पर ध्यान बढ़ता है।

2. कौशल हस्तांतरण: अनुभवी शिल्पकारों द्वारा युवाओं को प्रशिक्षण देना पारंपरिक तकनीकों के निरंतर उपयोग और विकास के लिए आवश्यक है।

3. आजीविका के अवसर: यदि हस्तशिल्प को बेहतर बाजार, उचित मूल्य और विपणन सहायता मिले, तो इससे स्थानीय कारीगरों की आजीविका मजबूत करने में मदद मिल सकती है।

समाचार विश्लेषण: पारंपरिक कला को आगे बढ़ाने के लिए क्या जरूरी है?

राष्ट्रीय सम्मान किसी शिल्पकार की उपलब्धि को पहचान देता है, लेकिन पारंपरिक कला का दीर्घकालिक संरक्षण व्यापक सहयोग पर निर्भर करता है। इसके लिए स्थानीय स्तर पर प्रशिक्षण केंद्रों और गुरु-शिष्य परंपरा को प्रोत्साहित करना, कारीगरों को आधुनिक बाजारों से जोड़ना, हस्तशिल्प प्रदर्शनियों में भागीदारी बढ़ाना और डिजिटल माध्यमों से कलाकृतियों का प्रचार करना उपयोगी हो सकता है।

साथ ही, युवा पीढ़ी को पारंपरिक तकनीक सिखाने के लिए अनुभवी शिल्पकारों के ज्ञान का दस्तावेजीकरण किया जाना चाहिए। इससे शिल्पकला का ज्ञान केवल व्यक्तिगत अनुभव तक सीमित न रहकर व्यापक रूप से उपलब्ध हो सकेगा। कारीगरों को उचित मूल्य, डिजाइन विकास और उत्पादों की प्रामाणिकता की पहचान दिलाने के प्रयास भी आवश्यक हैं। इस तरह राष्ट्रीय सम्मान को सांस्कृतिक संरक्षण और आर्थिक सशक्तिकरण से जोड़ा जा सकता है।

निष्कर्ष :

कोंडागांव के बानू राम बैद का शिल्प गुरु अवार्ड 2025 के लिए चयन छत्तीसगढ़ की पारंपरिक हस्तशिल्प विरासत के लिए महत्वपूर्ण उपलब्धि है। उनकी कला बस्तर की सांस्कृतिक पहचान, पारंपरिक तकनीक और स्थानीय जीवन को अभिव्यक्त करती है। अब आवश्यकता है कि इस पहचान को नई पीढ़ी के प्रशिक्षण, कारीगरों की आजीविका और ढोकरा शिल्प के व्यापक प्रचार-प्रसार से जोड़ा जाए, ताकि बस्तर की यह परंपरा आने वाली पीढ़ियों तक सुरक्षित रह सके।

स्रोत :

भारत सरकार, वस्त्र मंत्रालय — हस्तशिल्प एवं शिल्प गुरु अवार्ड संबंधी दस्तावेज

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