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CGPSC Mains Result 2025: 265 पदों के लिए सिर्फ 608 अभ्यर्थी इंटरव्यू में, 795 क्यों नहीं? न्यूनतम अर्हता पर उठे सवाल

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छत्तीसगढ़ लोक सेवा आयोग द्वारा राज्य सेवा मुख्य परीक्षा 2025 का परिणाम जारी होने के बाद अभ्यर्थियों के बीच एक महत्वपूर्ण बहस शुरू हो गई है। 265 पदों के लिए 608 अभ्यर्थियों को ही इंटरव्यू के लिए चिन्हित किया गया, जबकि निर्धारित प्रक्रिया के आधार पर यह संख्या लगभग 795 तक होनी चाहिए थी।

आयोग ने स्पष्ट किया है कि कम संख्या में अभ्यर्थियों के चयन का कारण प्रत्येक प्रश्न-पत्र में न्यूनतम अर्हकारी अंक प्राप्त करना अनिवार्य होना है। लेकिन अभ्यर्थियों के बीच यह सवाल भी उठ रहा है कि जब यही उम्मीदवार एक कठिन प्रारंभिक परीक्षा पार करके मुख्य परीक्षा तक पहुंचे, तो मुख्य परीक्षा में बड़ी संख्या में अभ्यर्थी न्यूनतम अर्हता तक भी क्यों नहीं पहुंच पाए?

यह मामला केवल इस परीक्षा का नहीं है, बल्कि CGPSC की परीक्षा प्रणाली, प्रश्नपत्रों की कठिनाई, मूल्यांकन प्रक्रिया और अभ्यर्थियों के बीच समान अवसर से जुड़ा बड़ा प्रश्न बन गया है।

CGPSC Mains 2025 Result: आखिर पूरा मामला क्या है?

CGPSC राज्य सेवा परीक्षा 2025 के अंतर्गत 20 सेवाओं के कुल 265 पदों पर भर्ती की जा रही है। प्रारंभिक परीक्षा के परिणाम के बाद 3,921 अभ्यर्थियों को मुख्य परीक्षा के लिए चिन्हित किया गया था।मुख्य परीक्षा जून 2026 में आयोजित हुई और परिणाम आने के बाद 608 अभ्यर्थियों को इंटरव्यू के लिए शॉर्टलिस्ट किया गया।

795 की जगह 608 उम्मीदवार ही क्यों?

आयोग के अनुसार: – अनारक्षित वर्ग: प्रत्येक पेपर में न्यूनतम 33% , आरक्षित वर्ग: प्रत्येक पेपर में न्यूनतम 23% ,अर्थात किसी अभ्यर्थी के कुल अंक अच्छे होने के बावजूद यदि वह किसी एक अनिवार्य पेपर में न्यूनतम अर्हता प्राप्त नहीं करता है, तो वह आगे की प्रक्रिया में शामिल नहीं हो सकता।

अभ्यर्थियों का सवाल: जब Prelims पास किया तो Mains में इतनी बड़ी संख्या फेल कैसे?

प्रारंभिक परीक्षा स्वयं एक screening stage है। 265 पदों के लिए लगभग 1.5 लाख  अभ्यर्थियों के बीच प्रतिस्पर्धा के बाद केवल 3,921 अभ्यर्थी मुख्य परीक्षा के लिए चुने गए थे। इसलिए अभ्यर्थियों का तर्क है कि जो उम्मीदवार इतनी प्रतिस्पर्धा के बाद Mains तक पहुंचे, उनमें से इतनी बड़ी संख्या का किसी एक या अधिक पेपर में न्यूनतम 33%/23% अंक भी प्राप्त न कर पाना स्वाभाविक रूप से सवाल खड़े करता है।

लेकिन यहां एक बात स्पष्ट रखना जरूरी है: Prelims पास करना यह प्रमाणित नहीं करता कि प्रत्येक उम्मीदवार Mains के हर विषय में न्यूनतम अंक प्राप्त करने में सक्षम होगा। दोनों परीक्षाओं की प्रकृति, पाठ्यक्रम और उत्तर लेखन की मांग अलग है। इसलिए केवल परिणाम के आंकड़ों से यह निष्कर्ष निकालना उचित नहीं होगा कि मूल्यांकन में अनिवार्य रूप से कोई गड़बड़ी हुई है।

विवाद के पीछे तीन संभावित दृष्टिकोण :

1.क्या मूल्यांकन में अधिक उदारता की आवश्यकता थी?

Descriptive examination में उत्तरों की गुणवत्ता, प्रस्तुति, तथ्य, विश्लेषण और भाषा जैसे कई पहलू महत्वपूर्ण होते हैं। ऐसे में कुछ अंकों का अंतर उम्मीदवार के पूरे करियर की दिशा बदल सकता है। इसलिए अभ्यर्थियों की मांग हो सकती है कि आयोग मूल्यांकन की पारदर्शिता और standardisation को और स्पष्ट करे।

2.क्या भाषा माध्यम से संबंधित कोई असमानता है?

दूसरी चर्चा Hindi Medium बनाम English Medium को लेकर है।कुछ अभ्यर्थियों के बीच यह आशंका है कि क्या किसी विशेष भाषा माध्यम को मूल्यांकन में अप्रत्यक्ष लाभ मिला है।हालांकि इस प्रकार की किसी भी ‘लॉबी’ या जानबूझकर किसी एक माध्यम को अधिक अंक देने की बात का कोई प्रमाण सामने नहीं आया है।

इसलिए इसे तथ्य की तरह प्रस्तुत करना उचित नहीं होगा। लेकिन अभ्यर्थियों की चिंता को दूर करने के लिए आयोग यदि माध्यमवार statistical data या evaluation methodology के संबंध में अधिक पारदर्शिता उपलब्ध कराए, तो विवाद काफी हद तक समाप्त हो सकता है।

3.क्या किसी एक कठिन Paper ने बड़ी संख्या में अभ्यर्थियों को बाहर किया?

तीसरा और सबसे महत्वपूर्ण सवाल Paper-4 जैसे विषयों की कठिनाई को लेकर है यदि किसी एक प्रश्न-पत्र का स्तर अन्य पेपरों की तुलना में बहुत अधिक कठिन रहा हो और उसी पेपर में बड़ी संख्या में अभ्यर्थी न्यूनतम अर्हता से नीचे रह गए हों, तो इसका सीधा प्रभाव पूरे परिणाम पर पड़ सकता है।

विशेष रूप से ऐसे अभ्यर्थी, जिनकी शैक्षणिक पृष्ठभूमि Arts/Humanities रही है, उनके लिए Science/Mathematics आधारित कठिन प्रश्नपत्र चुनौतीपूर्ण हो सकता है। मान लीजिए किसी उम्मीदवार ने बाकी 6 पेपरों में बहुत अच्छा प्रदर्शन किया, लेकिन केवल एक पेपर में 33% से कम अंक रह गए। मौजूदा न्यूनतम-पेपर-वार अर्हता के कारण वह उम्मीदवार कुल अच्छे प्रदर्शन के बावजूद इंटरव्यू की दौड़ से बाहर हो सकता है।

क्या CGPSC का नियम गलत है?

नियम अपने आप में नया या परिणाम के बाद बनाया गया नियम नहीं है। आयोग ने स्पष्ट किया है कि प्रत्येक प्रश्न-पत्र में निर्धारित न्यूनतम अंक प्राप्त करना अनिवार्य है। इसलिए केवल इसलिए कि इस बार 795 की अपेक्षा 608 अभ्यर्थी चयनित हुए हैं, यह कहना कि आयोग ने नियमों का उल्लंघन किया है—सही नहीं होगा। लेकिन दूसरी ओर, अभ्यर्थियों का यह सवाल भी पूरी तरह नजरअंदाज नहीं किया जा सकता कि: क्या प्रत्येक पेपर का difficulty level संतुलित था? क्या evaluation में पर्याप्त standardisation था?, क्या किसी एक पेपर ने असामान्य रूप से बड़ी संख्या में candidates को बाहर किया? इन सवालों का उत्तर आंकड़ों और आधिकारिक विश्लेषण से ही मिल सकता है। आयोग को क्या स्पष्ट करना चाहिए?

अभ्यर्थियों की संतुष्टि के लिए आयोग यदि संभव हो तो निम्न जानकारी सार्वजनिक करे:

1. प्रत्येक पेपर का average score

2. प्रत्येक पेपर में 33%/23% से कम अंक पाने वाले उम्मीदवारों की संख्या

3. Paper-wise highest और lowest marks

4. Hindi और English medium का comparative performance data

5. प्रत्येक पेपर का difficulty analysis

6. यदि लागू हो तो moderation/standardisation methodology

7. अलग-अलग papers में qualifying threshold के नीचे रहने वाले candidates का statistical breakup

ऐसी जानकारी से यह समझने में मदद मिलेगी कि 187 अभ्यर्थियों की कमी का कारण वास्तव में केवल paper-wise minimum qualifying marks था/ या इसके पीछे कोई अन्य परीक्षा-संबंधी pattern भी मौजूद है। विवाद को खत्म करने का सबसे बेहतर तरीका आरोप-प्रत्यारोप नहीं, बल्कि डेटा आधारित पारदर्शिता है।

CGPSC Aspirants के लिए सबसे महत्वपूर्ण बात: केवल Overall Score पर निर्भर रहना खतरनाक है। यदि नियम के अनुसार प्रत्येक पेपर में न्यूनतम अंक अनिवार्य हैं, तो तैयारी की रणनीति ऐसी होनी चाहिए कि: हर पेपर में Minimum Qualifying Marks + Overall Competitive Score दोनों हासिल हों। किसी एक कमजोर विषय को छोड़कर केवल मजबूत विषयों पर ज्यादा अंक लाने की रणनीति Mains में जोखिमपूर्ण हो सकती है।

निष्कर्ष: सवाल उठाना जरूरी है, लेकिन निष्कर्ष तथ्यों के आधार पर होना चाहिए:

GPSC Mains 2025 का परिणाम निश्चित रूप से अभ्यर्थियों के बीच चर्चा का विषय है। 265 पदों के मुकाबले केवल 608 उम्मीदवारों का इंटरव्यू तक पहुंचना सामान्य अपेक्षा से कम है और इसके कारणों को समझना अभ्यर्थियों का स्वाभाविक अधिकार है/ आयोग ने इसका कारण प्रत्येक पेपर में न्यूनतम अर्हकारी अंक की अनिवार्यता बताया है।

लेकिन इसके साथ ही मूल्यांकन की पारदर्शिता, प्रश्नपत्रों की कठिनाई और paper-wise परिणामों के आंकड़े सामने आने से अभ्यर्थियों की शंकाओं का बेहतर समाधान हो सकता है। बिना प्रमाण किसी भाषा माध्यम, किसी समूह या किसी ‘लॉबी’ पर आरोप लगाना उचित नहीं है। यदि वास्तव में कोई समस्या है तो उसका सबसे मजबूत आधार भावनाएं नहीं, बल्कि डेटा, आधिकारिक दस्तावेज और पारदर्शी विश्लेषण होगा।

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